कल्पित इच्छाएं

 


मेरे घर में आई थी तुम, 

अपने सौ अरमान लिए।

सतरंगी सपनों को लेकर, 

अपनी ही पहचान लिए ॥

कुछ को पूर्ण किया है मैंने, 

कुछ को तुमने करवाया।

नए दौर की लड़की हो तुम, 

माँ- पापा को समझाया ॥


हाँ मैंने संकल्प किये थे, 

तुमको खुशियाँ देने के।

बरबस सारे मोल चुकाए, 

सुख से नैया खेने के ॥

घर की ख़ामोशी कह जाती, 

तुम पूरी संतुष्ट नहीं।

माँ छिपकर रो लेती लेकिन, 

हुई कभी भी रुष्ट नहीं ॥


हाँ मेरा ही चयन रही तुम, 

कहाँ तुम्हारा दोष रहा? 

मेरे अनुचित समझौते थे, 

अतः न तुम पर रोष रहा ॥

जाने क्या-क्या खो आए हैं,

और शेष क्या-क्या इच्छाएँ|


तनिक सोचना बिखरावों में,

आखिर क्या सुख पाया है?

आज़ादी की चाहत में ही,

संस्कार का कोष लुटा।

क्या आनन्द अकेलेपन में? 

जीवन है बस घुटा-घुटा ॥

बच्चों के मन में तो ऐसा, बीज नहीं बोना 

और शेष क्या-क्या इच्छाएँ, सारी कह दो ना 


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