मुझे चाँद देखना पसंद है उसे चाँद सा दिखना पसंद है वो भी अपने दाग़ नहीं छुपाती माथे पे बिंदी नहीं लगाती होंठों को उनके ही हाल पे छोड़ देती मुस्कुराते ही समाज के सारे बंधन तोड़ देती उसे कौन सिखाए सजना सँवरना मैं खुश हूँ मैं खुश हू कि वो आईने से अपना हाल नहीं पूछती ये वो है नहीं ये बे फ़िज़ूल सवाल नहीं पूछती सोंचो अगर वो काजल लगा ले इत्तफा अनसुलझे बाल सुलझा ले ये जमाना अपना रुख़ न बदल ले हर कोई उसके साथ न चल दे ये हवाएँ रुक न जाएँ देखने को कहीं मैंने जब से देखा है मैं हूँ वहीं उसे देखा है जब से होश आने लगा है जमाने का सारा ख़ौफ़ जाने लगा है। उसे कोई तोहफ़ा देने को जी चाहता है मगर उसके लायक़ कुछ कहाँ आता है
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